तलवार उठाओ, द्रोपदी, इस बार बचाने गोविंद नहीं आएंगे,
छोडो मेहँदी खडक संभालो,
खुद ही अपना चीर बचा लो,
द्यूत बिछाये बैठे शकुनि,
मस्तक सब बिक जायेंगे,
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे!
कब तक आस लगाओगी तुम,
बिक़े हुए अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो,
दुशासन दरबारों से,
स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं,
वे क्या लाज बचायेंगे,
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयंगे!
तलवार उठाओ, द्रोपदी,
इस बार बचाने गोविंद नहीं आएंगे,
युद्ध के मैदान में तुम्हारी शक्ति है,
जो हर मुसीबत से लड़कर जीत पाएगा।
तुम हो एक शक्ति का प्रतीक,
जो दुनिया को दिखाए राह,
तुम्हारी ऊर्जा से है आसमान को छूने का हौसला,
और हर कदम पे हैं तुम्हारे साथ।
द्रोपदी, तुम हो भारत की शान,
जिसने हर कदम पे लडकर जीता है,
तुम्हारी शक्ति से है देश की तकदीर,
जो हर कदम पे है तुम्हारे साथ।
तलवार उठाओ, द्रोपदी,
इस बार बचाने गोविंद नहीं आएंगे,
अपने साथ सबको लेके चलो,
और उनको जीत का एहसास दिखाओ।
Suryansh
21-Jul-2023 08:20 AM
मित्र ऊपर के दोनों पद्य खंड किसी प्रसिद्ध कवि के लिखे हुए हैं,,,,,,,,,, जहां से आपकी लिखी पंक्तियाँ हैं उनमें,,, और ऊपर की पंक्तियों में जमीन आसमान का अन्तर है
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Gunjan Kamal
20-Jul-2023 10:52 PM
शानदार प्रस्तुति 👌
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Varsha_Upadhyay
20-Jul-2023 03:20 PM
लग रहा कुछ शब्द मिसिंग है
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